हेडलाइन: रणथम्भौर की अनूठी पहल: 'बाघ रक्षक' बनकर जंगल से जुड़ रहे विद्यार्थी और ग्रामीण; 9 हजार से ज्यादा लोगों ने किया निःशुल्क भ्रमण
सब-हेडलाइन: वन्यजीव संरक्षण के लिए टाइगर रिजर्व प्रशासन का नवाचार, स्कूलों में प्रतियोगिताओं और फिल्म प्रदर्शन से दिया जा रहा पर्यावरण बचाने का संदेश।
सवाई माधोपुर:
डिजिटल दुनिया में खोई नई पीढ़ी और जंगल के किनारे बसे ग्रामीण समुदाय को प्रकृति के करीब लाने के लिए रणथम्भौर टाइगर रिजर्व प्रशासन ने एक सराहनीय कदम उठाया है। 'रणथम्भौर बाघ रक्षक' नामक इस नवाचार कार्यक्रम के माध्यम से हजारों विद्यार्थियों और ग्रामीणों को जंगल की सैर कराकर वन्यजीव संरक्षण का पाठ पढ़ाया जा रहा है।
किताबी ज्ञान से आगे वास्तविक अनुभव
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य लोगों को केवल किताबी बातों तक सीमित न रखकर, उन्हें जंगल के वास्तविक माहौल से रूबरू कराना है। अभियान के तहत अब तक एक बड़ी उपलब्धि हासिल की गई है। कुल 9,173 से अधिक प्रतिभागियों को रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान का निःशुल्क भ्रमण कराया जा चुका है। इनमें 120 विद्यालयों के 8,423 विद्यार्थी व शिक्षक शामिल हैं, जबकि 750 ग्रामीण महिला-पुरुषों ने भी जंगल को करीब से देखा है। भ्रमण के दौरान प्रतिभागियों को बाघों के प्राकृतिक आवास, पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण संतुलन में उनकी भूमिका के बारे में मौके पर ही जानकारी दी जाती है।
जागरूकता के लिए बहुआयामी प्रयास
सिर्फ जंगल सफारी ही नहीं, बल्कि जागरूकता के लिए प्रशासन कई अन्य तरीके भी अपना रहा है। विद्यालयों में वन्यजीवों पर आधारित फिल्में दिखाई जा रही हैं। इसके अलावा, प्रश्न-उत्तर सत्र, निबंध लेखन और चित्रकला प्रतियोगिताओं के जरिए बच्चों में पर्यावरण के प्रति संवेदना जगाई जा रही है। प्लास्टिक मुक्त भारत की दिशा में योगदान देते हुए जूट के थैले वितरित किए जा रहे हैं और जानकारी पुस्तिकाएं देकर संरक्षण की उपयोगिता समझाई जा रही है।
'सह-अस्तित्व' है मूल मंत्र
उप वन संरक्षक एवं उप क्षेत्र निदेशक मानस सिंह ने इस पहल के पीछे की सोच स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम का मूल उद्देश्य बच्चों और समुदाय को यह समझाना है कि बाघ और जंगल केवल जानवरों के लिए नहीं, बल्कि मानव जीवन के अस्तित्व के लिए भी अनिवार्य हैं। प्रशासन का प्रयास मानव और वन्यजीवों के बीच 'सह-अस्तित्व' की भावना विकसित करना है, ताकि लंबे समय तक संरक्षण सुनिश्चित हो सके। स्थानीय शिक्षण संस्थान भी इस पहल को समाज निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रहे हैं।





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